पत्नी आज भी रो रो कर अपना दुख बया करती है
मेहनत किया है दिल तो दुखेगा मजदूर का पर ऐसे बहुत से लोग है जो मजदूरो की जान पैसा सब ले लेते है कविता के माध्यम से समझे और शेयर करे -----
" क्यों कराते हो उन्हें इतना काम
अगर नही दे सकते उन्हें उनके मेहनत का दाम
कराते है गुलामी सुबह से शाम
अपने ही शहर में है कुछ बड़े -बड़े नाम
पल भर भी उन्हें नही करने देते आराम
फिर क्यों करते हो उनके दुखमयी जीवन को हराम "
" मजदूर ही करता है कठोर परिश्रम
किन्तु समाज में बैठे है कुछ दल्ले बेशर्म
उनकी मेहनत पर जीते है हरदम
परंतु छीनकर हक से भी रुपए देते है कम
शिक्षित व्यक्ति भी न इस बात पर करे अमन
आत्मा गवाह देती है पर उन्हें आती नही शर्म "
"अरे जीवन कट जाती है उनकी हरदम थकान में
नही रहते वे लोग अच्छे पक्के मकान में
सच्चाई होती है उनकी आत्मा और जुबान में
चिंतित रहता है हरदम सुकून नही मिलता आराम में
मेहनत कर जाते है सर्दी हो या जुखाम में
और दे जाते है आधी पगार दवाइयों के दुकान में "
"एक मात्र करता मजदूर ही कड़ी मजदूरी
क्योंकि जीवन मे है उसकी काफी मजबूरी
आपके नसीब में तो है ही रोज चिकन तंदूरी
फिर क्यों छिनते हो उनकी एक वक्त की दाल मसूरी
परिवार से बन्ध कर रहता है वही जाने कितनी दूरी
जिंदगी गुजर जाती है रह जाती है अरमाने अधूरी
रह जाती है अरमाने अधूरी //
"खुशियां ही उनके घाव रूपी मन की राहत
उन्हें न लाखो -करोड़ो की चाहत
खुशी न सही न दो गम की आहट
करो भलाई उनकी मिल जाये कुछ राहत "
रचनाकार - सोनू साव
पिछली कविता पढ़े- न जाने क्यों लोग हमसे बेवजह जलते है
अगर नही दे सकते उन्हें उनके मेहनत का दाम
कराते है गुलामी सुबह से शाम
अपने ही शहर में है कुछ बड़े -बड़े नाम
पल भर भी उन्हें नही करने देते आराम
फिर क्यों करते हो उनके दुखमयी जीवन को हराम "
" मजदूर ही करता है कठोर परिश्रम
किन्तु समाज में बैठे है कुछ दल्ले बेशर्म
उनकी मेहनत पर जीते है हरदम
परंतु छीनकर हक से भी रुपए देते है कम
शिक्षित व्यक्ति भी न इस बात पर करे अमन
आत्मा गवाह देती है पर उन्हें आती नही शर्म "
"अरे जीवन कट जाती है उनकी हरदम थकान में
नही रहते वे लोग अच्छे पक्के मकान में
सच्चाई होती है उनकी आत्मा और जुबान में
चिंतित रहता है हरदम सुकून नही मिलता आराम में
मेहनत कर जाते है सर्दी हो या जुखाम में
और दे जाते है आधी पगार दवाइयों के दुकान में "
"एक मात्र करता मजदूर ही कड़ी मजदूरी
क्योंकि जीवन मे है उसकी काफी मजबूरी
आपके नसीब में तो है ही रोज चिकन तंदूरी
फिर क्यों छिनते हो उनकी एक वक्त की दाल मसूरी
परिवार से बन्ध कर रहता है वही जाने कितनी दूरी
जिंदगी गुजर जाती है रह जाती है अरमाने अधूरी
रह जाती है अरमाने अधूरी //
'चार पंकितयों में एक मेंरे तरफ से संंदेेश हो सकें तो अमल जरूर करें
"खुशियां ही उनके घाव रूपी मन की राहत
उन्हें न लाखो -करोड़ो की चाहत
खुशी न सही न दो गम की आहट
करो भलाई उनकी मिल जाये कुछ राहत "
रचनाकार - सोनू साव
पिछली कविता पढ़े- न जाने क्यों लोग हमसे बेवजह जलते है

2 Comments
Very nice poem ...sonu ji👌👌👍
ReplyDeleteThank uhh so much
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