न जाने क्यों लो[ग हमसे बेवजह ही जलते है (जलने वाले लोगो पर कविता )
पर मूंह से जय श्री राम कहकर निकलते हैं
होते है ऐसे निंदनीय कुछ लोग
भाई -भाई कहकर दिखावे के लिए ही मचलते हैं
कहते है शुभचिन्ता हूँ तुम्हारा मुसीबत पर आवाज़ लगाना
किन्तु समय आने पर गिरगिट से भी तेज रंग बदलते है
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
कुछ लोग है जो हमारी छोटी सी हसी पर पिघलते है
और कुछ लोग है जो हमारी छोटी सी खुशी पर जलते है
पर वो क्या जाने
मालूम ही नही उन्हें की हम कितने आग में जलते है
चन्द खुशियों को पाने के लिये
कितने परेशानियों को साथ लेकर चलते है
फिर भी
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते हैं
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
सायद जलने की वजह बेवजह नही होगी उनकी
क्यूंकि हम परिश्रम के पसीने से धुलते है
सोचते नही कभी गहराई से वो लोग
इंसान होकर इंसानियत को भूलते है
गाड़ियाँ जहाँ लोग दिन में में तीन-तीन बार बदलते हैं
हम काम से लौट कर उसी पसीने से सने कपडे में टहलते हैं
फिर भी
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
काश जल्द समझ में आये उन्हें ये बात
जिन अंगार भरे रास्तो से हम दहलते है
कम ही लोग है इस दुनिया में
जो ऐसे कठिनाई भरे रास्तो पर चलते है
सख्सियत पाने के लिए अंदाज़ हमारा कुछ ऐसा है की
जिन तुफानो में हम जुनूनी लोग टहलते है
उन तुफानो में लोग सायद घर से ही नही निकलते है
सायद तभी कामयाबी के पथ पर चलते है
इसलिए
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
चोट हमे भी लगती है किसी के बातों का तो किसी के यादों का
पर हम न कभी कोई मानाने वाले ढूंढते है
क्योंकि साथ जो निभा सके सिददत से
अब ऐसे लोग ही कहा मिलते हैं
दुखी बैठ कर उस बात को भूलते है
समय बताएगा यह सोचकर
एक नयी जोश के साथ अपनी मंजिल पर निकलते है
उनहे जलने से न कुछ मिलते है फिर भी
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
हर सुबह प्रेमिका से एक बात होती है
की चलो आज कही मिलते है
पर ना जाने यह कहकर- कहकर कितने
शाम टलते है
जिम्मेदारियों के वजह से अपने वादे हर बार
बदलते है
हमें भी शौक होगा अय्य्सस घुमने का
पर हमारा सुबह से शाम बेजान ही ढ़लते है
फिर भी
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
दुनिया में साथ-साथ तो बहुत ही सारे लोग चलते है
पर कम ही होते है वैसे लोग
जिनके मिलने पर ह्रदय में प्रसन्न्ता के फुल खिलते है
उनकी वाणी में प्रेम रूपी एक मिठाश होता है
सुन ले अगर कोई श्रोता तो घंटो तक नही हिलते है
किन्तु यह घोर कलयुग का युग है साहब
ऐसे लोग बड़ी मुस्किल से ही मिलते है
जलने वाले तो जिन्दगी भर जलते है
मृत्यु पश्चात् उनकी इस भाव का फल उन्हें जरुर मिलते है
कब्र पर खिलने थे जहाँ सैकड़ो फुल
वहां दो -चार ही खिलते है
इन्सान तो इन्सान है जनाब
हवाएं भी अपना रुख मोड़ लेती है
जब उन लोगो के लिए कोई गंगा नदी में भी दीप ढीलते है
फिर
ना जाने क्यों लोग बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर बार मिलते है
रचनाकार - सोनू साव
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते हैं
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
दिल में रखते है छुरीना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
पर मूंह से जय श्री राम कहकर निकलते हैं
होते है ऐसे निंदनीय कुछ लोग
भाई -भाई कहकर दिखावे के लिए ही मचलते हैं
कहते है शुभचिन्ता हूँ तुम्हारा मुसीबत पर आवाज़ लगाना
किन्तु समय आने पर गिरगिट से भी तेज रंग बदलते है
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
कुछ लोग है जो हमारी छोटी सी हसी पर पिघलते है
और कुछ लोग है जो हमारी छोटी सी खुशी पर जलते है
पर वो क्या जाने
मालूम ही नही उन्हें की हम कितने आग में जलते है
चन्द खुशियों को पाने के लिये
कितने परेशानियों को साथ लेकर चलते है
फिर भी
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते हैं
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
सायद जलने की वजह बेवजह नही होगी उनकी
क्यूंकि हम परिश्रम के पसीने से धुलते है
सोचते नही कभी गहराई से वो लोग
इंसान होकर इंसानियत को भूलते है
गाड़ियाँ जहाँ लोग दिन में में तीन-तीन बार बदलते हैं
हम काम से लौट कर उसी पसीने से सने कपडे में टहलते हैं
फिर भी
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
जिन अंगार भरे रास्तो से हम दहलते है
कम ही लोग है इस दुनिया में
जो ऐसे कठिनाई भरे रास्तो पर चलते है
सख्सियत पाने के लिए अंदाज़ हमारा कुछ ऐसा है की
जिन तुफानो में हम जुनूनी लोग टहलते है
उन तुफानो में लोग सायद घर से ही नही निकलते है
सायद तभी कामयाबी के पथ पर चलते है
इसलिए
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
पर हम न कभी कोई मानाने वाले ढूंढते है
क्योंकि साथ जो निभा सके सिददत से
अब ऐसे लोग ही कहा मिलते हैं
दुखी बैठ कर उस बात को भूलते है
समय बताएगा यह सोचकर
एक नयी जोश के साथ अपनी मंजिल पर निकलते है
उनहे जलने से न कुछ मिलते है फिर भी
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
की चलो आज कही मिलते है
पर ना जाने यह कहकर- कहकर कितने
शाम टलते है
जिम्मेदारियों के वजह से अपने वादे हर बार
बदलते है
हमें भी शौक होगा अय्य्सस घुमने का
पर हमारा सुबह से शाम बेजान ही ढ़लते है
फिर भी
ना जाने क्यों लोग हमसे बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर जगह पर मिलते है
पर कम ही होते है वैसे लोग
जिनके मिलने पर ह्रदय में प्रसन्न्ता के फुल खिलते है
उनकी वाणी में प्रेम रूपी एक मिठाश होता है
सुन ले अगर कोई श्रोता तो घंटो तक नही हिलते है
किन्तु यह घोर कलयुग का युग है साहब
ऐसे लोग बड़ी मुस्किल से ही मिलते है
जलने वाले तो जिन्दगी भर जलते है
परन्तु जब वे मृत्यु सय्या पर होते है तो
उन्हें यह बात बहुत ज्यादा खलते है
ना जाने क्यों लोग बेवजह ही जलते है
ना चाहते है मिलना पर वे लोग हर बार मिलते है
कब्र पर खिलने थे जहाँ सैकड़ो फुल
वहां दो -चार ही खिलते है
इन्सान तो इन्सान है जनाब
हवाएं भी अपना रुख मोड़ लेती है
जब उन लोगो के लिए कोई गंगा नदी में भी दीप ढीलते है
फिर
ना जाने क्यों लोग बेवजह ही जलते है
रचनाकार - सोनू साव
2 Comments
Nyc line
ReplyDeleteVery nice line bro
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