गुटखा ( गुटखा पर पंक्तियाँ )
- क्यों मैं गुटखा खाता ( गुटखा पर कविता )
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- मैं गुटखा खाता , मै गुटखा खाता
- जाने क्यों ? मैं गुटखा खाता
- जगह जगह पर मुहं छिपाता
- न जाने क्यूँ ? मैं गुटखा खाता /
- लगा ली मैंने आदत ऐसी
- बुला ली मैंने आफत कैसी
- न रही अब राहात वैसीं
- मूंह लगती कूड़े`दान के जैसी //
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- न अब मैं हंस पाता
- न अब कुछ मन को भाता
- जगह जगह पर गुटखा खाता
- लोगों में बस मुंह हिलाता /
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- नही होगी कोई दानी ऐसो
- जो ना दे आरंभ में इसको
- जब लग जाएगी लत तुमको
- याद करोगे अंत में उसको
- हैं खाने वाले ऐसे -ऐसे गुटखा
- जैसे हों फैक्ट्री खुदका
- क्योंकि इसका नाम ही है गुटखा
- आसानी से न पीछा छुटता //
- परिजनों में होता सर नींचा
- फिर भी न छूटता पीछा
- गुटके ने हर किसी को
- अपने ओर में खिंचा
- जिसने त्यागा खुसी से वही है जीता
- मैं गुटखा खाता , मै गुटखा खाता
- जानें क्यों ? मैं गुटखा खाता
- जगह-जगह पर मुंह छिपाता
- न जानें क्यों ? मैं गुटखा खाता /
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- कवि -सोनू साव
- Concept _avinash tiwari
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1 Comments
Too good bhai
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