"जान थी वो मेरी 
मैं उनसे बेइम्तिहा प्यार  करता था 


थी एक लड़की जान थी वो मेरी X2
मैं उसे बेइम्तिहा प्यार करता था 
प्यार इस कदर थी की 
लोग तो एक बार मरते है 
मैं  दिन में चार बार मरता था

जहन में भी न आयी कभी की वो बेवफा होंगी 
  सायद मैं उन पर  हद से ज्यादा ऐतबार करता था 
   आंखों में उसकी सच्चाई थी बातों में उसकी गहराई 
जब तक प्यार से गुस्सा न करती 
      मन ही ना  भरता था
जी हाँ  जान थी वो मेरी 
  मैं उनसे बेइम्तिहा प्यार  करता था ,,

अपना पॉकेट-मनी देकर उसे
  उसकी छोटी-छोटी प्रॉब्लम को सॉल्व करता था 

   छोटी छोटी प्रॉब्लम की सॉल्यूशन से 
          उसकी होंठो पर आती उसकी हसी  
 और उस हसि को देखकर मुझे मिलती थी खुसी 
        यह सब  मैं यूही नही करता था 
भाई साहब जान थी वो मेरी
      मैं उनसे बेइम्तिहा प्यार करता था ,,

 
       और  बन गई थी सांसे ओ मेरी 
मैं उसे बेइम्तिहा प्यार करता था 

स्कूल वाली बस उसकी
रोज  मेरे घर के सामने से गुज़रता था
  जादू थी उसकी मुस्कुराहट में 
उसे देखने के लिए 
अपना  सारा टाइम बेकार करता था 

वापस दोपहर में वही बस
      मेरे सोप के सामने ठहरता था 
उसे देखे बिना नही मिलती थी सुकून 
उस सुकून को पाने के लिये 
 उसका घंटो तक  इंतिज़ार करता था
 क्योंकि जान थी वो मेरी 
 ,,मैं उसे बेइम्तिहा प्यार करता था,


उसके मिलने पर दुनिया रंगीन लगने लगा था
खाना -पीना छोड़कर
रात रात भर फोन पर बात किया कारता था
जितनी ओ सुंदर थी उससे भी प्यारी उसकी बातें
घंटो तक करते करते बातें रातें भी कम पडता था

रूठने की अदाएं भी अजीब थी उसमें
  एक बार रूठ  जाती तब घंटो तक मानाना पडता था
 भाई सहाब क़यामत थी वो  खुद में
मैं उसे  यूँही नही मनाया  करता था -
            जी हाँ जान थी वो मेरी 
      मैं उसे बेइम्तिहा प्यार करता था 

रचनाकर -  सोनू साव 



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